विश्व तंबाकू दिवस विशेषांक : युवाओं को गर्त में ले जाती धुम्रपान की आदत

 

स्वतंत्र हिमाचल

 

 

कोरोना की समस्या बढ़ने से इस वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस का आयोजन फीका रहा, देश में आंशिक लॉक डाउन जैसी स्थिति है,ऐसे हालात में भी तम्बाकू पदार्थो की खपत में कोई कमी देखने को नहीं मिली है। तम्बाकू का सेवन न करने के लिए बिशेष अभियान चलाए जा रहे हैं।

वैश्विक संस्थाएं और स्थानीय सरकारी गैर सरकारी संगठन लोगों को जागरुक करने का प्रयास करते है, लेकिन इन सबके बाबजूद धुम्रपान करने वालों की संख्या में ज्यादा कमी नही आयी है एक रिपोर्ट के अनुसार अभी भी विश्व भर में डेढ़ अरब लोग धूम्रपान या तम्बाकू के पदार्थ इस्तेमाल करते है, अपने आसपास हम रोज देखते है बहुत से युवा तम्बाकू या धूम्रपान की आदत में पड़ चुके हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार 1988 से तम्बाकू निषेध दिवस मनाना शुरु किया है इसका मुख्य लक्ष्य धुम्रपान करने वालों को जागरुक करना और तम्बाकू का सेवन करने वालों की संख्या में कमी लाना है इस समय विश्व भर में डेढ़ अरब से अधिक लोगों द्वारा तम्बाकू का सेवन और धुम्रपान किया जाता है,यह आँकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन का है जबकि वास्तविक संख्या कहीं अधिक हो सकती है, तम्बाकू इस्तेमाल के वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर ध्यान खींचने के लिए युवाओं पर ध्यान केन्द्रित करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तम्बाकू मुक्त युवा कार्यक्रम चलाया, यह कार्यक्रम 2008 में शुरु किया गया और तम्बाकू के विज्ञापनों प्रयोजनों और प्रचार सामग्री पर रोक लगाई, इस तरह के प्रयासों का उपरी स्तर पर लाभ भी मिला।

तम्बाकू और धूम्रपान सामग्री बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार प्रसार तो बंद कर दिया,विज्ञापन भी बंद हो गए लेकिन धरातल पर इसके इस्तेमाल में कोई कमी नहीं आयी, अभी भी धूम्रपान और तम्बाकू के सेवन से लाखों आदमी समय से पहले अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं,हिमाचल प्रदेश की यदि हम बात करें तो शिक्षित होने के बावजूद प्रदेश का युवा धूम्रपान की बुरी आदत से ग्रसित हैं।

प्रदेश का युवा धुम्रपान को शान समझ के इस्तेमाल करता है,नशामुक्ति केन्द्रों में जाने पर पता चलता है ज्यादातर स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थी इस की जद में आ चुके हैं,यह काम धुम्रपान से शुरु होकर अन्य महँगे नशों के इस्तेमाल पर जाकर रुकता है, केंद्रों में इलाज करने वाले ज्यादतर युवाओं का कहना है उनकी शुरुआत धुम्रपान से शुरु हुई,धीरे धीरे दूसरे नशों की ओर इन का ध्यान आकर्षित होता है। मानसिक रूप से कमजोर होने के बाद इनको आदत छुड़ाना बेहद कठिन कार्य है । इनको सामाजिक बहिष्कार के बजाए फिर डॉक्टर के इलाज की जरुरत रहती है’तम्बाकू का सेवन करने बालों को फेफडों का कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक ,दमा , महिलाओं में प्रजनन समस्या , मुहँ और गले का कैंसर , मधुमेह और मोतियाबिंद आदि बीमारियाँ अक्सर देखने को मिलती है।

तम्बाकू में सत्तर के लगभग हानिकारक रसायन होते हैं जिसमें निकोटीन , सीसा, बेन्जीन , फार्मल्डीहाइड ,अमोनिया, आर्सेनिक आदि रसायन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही घातक होते है ।

धूम्रपान या तम्बाकू सेवन से होने वाली कुल मौतों में छठा हिस्सा भारत का है ।

श्याम लाल हांडा
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कुल्लू

देश में कुल 25 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करते है । चूंकि उत्पादन की दृष्टी से भी देखें तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा तम्बाकू उत्पादक देश है विश्व का तम्बाकू इस्तेमाल करने वालों में से 15 प्रतिशत लोग भारत के है । आन्कड़ों से ही पता चलता है देश में यह समस्या कितनी गम्भीर है। इसमें भी ज्यादातार संख्या युवाओं की है । देश में यह समस्या अब केवल सरकारी न होकर सामजिक बन गई है।

युवाओं को इस से दूर रखने के लिए गम्भीर प्रयासों की आवश्यकता है । यह केवल दिवस मनाने से खत्म होने वाली नहीं है । और न ही स्कूली स्तर पर छुटपुट प्रतियोगिता होने से समस्या हल होगी ।

इसके लिए बड़े प्रयासों की आवश्यकता है जिसमें सरकार के साथ साथ समाज के हर वर्ग की भूमिका हो ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से स्कूली और शिक्षण संस्थानों के आसपास सौ मीटर के दायरे में तम्बाकू के पदार्थों की बिक्री निषेध है यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन अभी भी बहुत सी जगह इसपर अमल करने में कुछ लोगों द्वारा कोताही की जा रही है । छतीसगढ सरकार ने जरुर इस इसमें पहल की है, यलो लाईन कार्यक्रम के तहत वहाँ सौ मीटर के दूरी पर हर एक शिक्षण संस्थान के आसपास निशान लगा दिए है और तम्बाकू सेवन और विक्री को बर्जित किया है ।

इस तरह के प्रयास सभी जगह अनिवार्य कर देने चाहिये जिस से समाज में सही संदेश जा सके।

वर्तमान में इसके लिए कठोर कानून देश में है जरुरत है तो ऐसे कानूनों की अनुपालना करने की । काम केवल सरकारी स्तर पर नहीं हो सकता। इसके लिए त्री स्तरीय रणनीति की आवश्यकता है।

सरकार कानून बना चुकी है इसका इस्तेमाल कुछ विशेष स्थानों पर प्रतिबंधित किया है इस के सार्वजनिक विज्ञापनों पर रोक लगी है । ऐसे किसी भी उत्पाद पर इस से होने वाली हानियां प्रमुख रूप से अंकित की जायें। लेकिन पुर्ण तौर पर ऐसे उत्पादों पर प्रतिबंध नहीं लगा है। जिस से समाज में इन चीजों का धडल्ले से प्रयोग किया जाता है। इस लिए तम्बाकू सेवन को कम करने के लिए समाजिक स्तर पर अधिक और गम्भीर प्रयासों की आवश्यकता है । समाज में कार्य करने वाली विभिन्न संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी होना लाजमी है तभी युवा पीढ़ी को धुम्रपान और तम्बाकू की लत से बचाया जा सकता है । महिला मंडल , युवक मंडल , स्वयं सहायता समूह , स्वयं सेवी संस्थाएं और ग्राम पंचायतें शहरी निकाय इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है । इनकी अधिक भागीदारी से समाजिक स्तर पर चेतना बधाई जा सकती है। इनके सहयोग से धुम्रपान करने वालों की समाजिक स्तर पर काउंसिलिंग हो सकती है। समाजिक भागीदारी से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी और वह अपने आप भी धुम्रपान से बच सकते है और दूसरे साथियों की भी मदद कर सकते है । तीसरा पक्ष है अभिभावक, यदि अभिभावक अपने बच्चों के प्रति सजग है तो यह समस्या आ ही नहीं सकती,जैसे ही युवावस्था में तम्बाकू सेवन की ओर आकर्षित होने लगे तो उसके साथ बातचीत करें और उसको इस से होने वाले नुक्सान से अवगत कराएं,यदि कभी ऐसा आभास होता है तो अपने बच्चों की अच्छे से काउंसिलिंग करने का प्रयास करें। धुम्रपान और तम्बाकू सेवन व्यक्तिगत समस्या तो है ही इसके अलावा यह सामाजिक और स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या भी है।

कोई यदि इसकी गिरफ्त में आ ही जाए तो इनका नशा मुक्ति केंद्रों और हॉस्पिटल में इलाज करवा देना चाहिए। तम्बाकू सेवन देश में बड़ी विकराल समस्या के रूप में सामने आई है। हॉस्पिटल्स में हजारों लोग आज भी तम्बाकू सेवन से हुई समस्याओं से ग्रसित है । चूंकि युवा पीढ़ी देश का भविश्य है। इनके प्रति अधिक सजग रहने की जरुरत है । खासतौर पर युवा के साथ साथ युवतियां भी धुम्रपान की ओर आकर्षित हुई है। इनके लिए विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता है।
विश्व स्वाथ्य संगठन हर साल नये थीम के साथ तम्बाकू निषेध दिवस मनाता है ।

वर्ष 2008 में तम्बाकू मुक्त युवा का नारा दिया था इस से विश्व भर में तम्बाकू और धुम्रपान के खिलाफ जंग छेड़ने का आवाह्न किया गया,ताकि विश्व को तम्बाकू सेवन की विकृत प्रवृति से बचाया जा सके । सामुहिक प्रयासों के बिना तम्बाकू और धुम्रपान से युवाओं को बचाया नहीं जा सकता।

सरकारी और गैर सरकारी दोनों तरह से गम्भीर प्रयास आवश्यक है ।

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