पांगणा के बाग-बखोल-गोडन में दिखे “प्रैहते” के रंग

 

स्वतंत्र हिमाचल

(चुराग) राज ठाकुर

सुकेत रियासत के गांव -गांव में प्रैहतों की शुरुआत ऐतिहासिकां नगरी पांगणा के बाग के “रड़ू परैते”से होती है। एक वक्त था जब प्रैहतों में संगीत रसिक प्रेमियो की भारी भीड़ उमड़ती थी।उस दौर में प्रैहतों में दर्शकों के हृदय तंत्र को झंकृति करते लोकनाट्य “बांठड़ा/करयाला” का ही विशेष आकर्षण रहता।”बांठड़ा”/”करयाला” की शुरुआत सुकेत रियासत के संस्थापक राजा वीर सेन के शासन काल में लोक नाट्य “बांठड़ा” की शुरुआत हुई।रियासती काल में पांगणा के पुराने बाजार में स्थित पांडवों द्वारा निर्मित आंगन(वर्तमान में देव थला के चबूतरे)पर जहां वीरसेन की न्याय पीठिका सजती थी वहीं जन जागरण के लिए बांठड़े का भी आयोजन होता था।कालांतर में सुकेत की इसी गौरवमयी लोकनाट्य परंपरा “बांठड़ा”/करयाला और “प्रैहतों” की शुरुआत सुकेत शासकों द्वारा बसाए बाग गांव से हुई।बाग नाथ समुदाय का ऐसा तीर्थ स्थल है जहां वर्षभर लोकगाथाओं की गूंज सुनाई देती है।इसी गांव में अनेक लोकगाथाओं की रचना हुई।सुकेत संस्कृति साहित्य और जन कल्याण मंच के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्र बाली जी का मानना है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि से “प्रैहते/करयाले” की शुरुआत होने का संबंध कहीं न कहीं रास लीला से भी है।

 

रियासती दौर में लोक कला की दृष्टि से समृद्ध गीत,संगीत व नाट्य कला से भरपूर बांठड़ा का स्वरुप पूर्णतः शास्त्रीय होता था।इसके संवाद बोलचाल की संस्कृत भाषा में होते थे।धीरे-धीरे यह संवाद पहाड़ी में बदले। बांठड़ा का मंचन क्षेत्र देवता “थलादेओ फरास” की उपस्थिति में खुले स्थान पर होता था।देवता के स्वागत के बाद गांव वासी ढोल नगाड़ों की धुन के साथ बांठड़ा स्थल पर अलाव जलाने के लिए सामुहिक रूप से “ठुंडरु” गायन और नृत्य करते हुए विशाल लकडिय़ों के”गेले”(ठेले) लाकर शुभ मुहूर्त में बांठड़ा मंचन स्थल के मध्य अलाव(घयाना)जलाते।रात्रि का भोजन करने के बाद देवता की “बेड़”(देव आवाहन)के बाद स्वच्छंद वातावरण में नाटी नृत्य चलता।नाटी नृत्य के पश्चात रात भर बांठड़े का मंचन होता।बांठड़ा की मंडली अपनी कला द्वारा अपने गौरवपूर्ण अतीत से अपनी कला के माध्यम से लोगों को परिचित करवाती।प्रत्येक कलाकार अपने हुनर की श्रेष्ठतम प्रतिभा का प्रदर्शन कर अमिट छाप छोड़ता। मंगलमयी “चंद्रौली” (राधा-कृष्ण के रास नृत्य) के साथ बांठड़ा के अखाड़े का दिग्बंधन होता।सुबह सूर्य की पहली किरण तक गीत-संगीत व “स्वांग” की अलौकिक उल्लासमयी झलकियों,लोकगीतों के साथ झूमते-नाचते गांव वासियों का जीवन हंसता खिलखिलाता रहता।पूरी रात आंतरिक अनुशासन और गांभीर्य मान-सम्मान देखने को मिलता।

इसी प्रकार एक गांव से दूसरे गांव तक बांठड़े के कलाकारों(स्वांगियों) की टोलियां अपनी कला से लोगों का जी भरकर मनोरंजन करने के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों पर प्रहार कर समाज सुधार का भी संदेश देतीं।रात भर संगीत की कई नदियां लय और ताल से बहती हुई संगीत के एक बड़े सागर में समाहित हो जाती।संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि
आज भी देवोत्सव के नाम से बांठड़े और प्रैहते के अवसर पर देवी-देवताओं के देवरथ ढोल-नगाड़ों,हार(प्रजा),कारदारों(देव समिति)के साथ गांव में पूर्ववत आते हैं।गांव की “धी”-“धयैणियां”,नाते-रिश्तेदार भी आते हैं।गाँव के आस-पास के निवासी प्रैहता स्थल में एकत्रित होते हैं।ठुन्डरू गीतों से रात भर जलने वाला “घयाना” (अलाव) जलता है लेकिन स्थानीय परिवेश पर आधारित पारंपरिक गौरवशाली लोकनाट्यों बांठड़ा, करयाला का मंचन नहीं होता।वैश्वीकरण के इस दौर ने सैकड़ों वर्ष तक मंनोरंजन की समृद्ध विधा रही “बांठड़ा” को पूर्णरूप से अलविदा कह दिया है। सुकेत रियासत की राजधानी रहे पांगणा के क्षेत्र देवता थलादेओ जी परंपरागत रूप से नाथ समुदाय के बाग तथा देओ महसू जी(बखराश)बखोल-गोडन गांव पहुंचे।देवता के आगमन के साथ “रड़ू प्रैहते”के साथ सुकेत क्षेत्र के”प्रैहतों” का भी शुभारम्भ हो गया।व्यापार मंडल पांगणा के प्रधान सुमीत गुप्ता, पांगणा पंचायत के उप-प्रधान बसंत लाल, युवा प्रेरक पुनीत गुप्ता,भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के मंडी जिला के प्रभारी जितेंद्र महाजन,तहसील करसोग के प्रभारी चेतन,सेवानिवृत कर्मचारी संघ के प्रधान धर्म प्रकाश शर्मा, वैज्ञानिक शरद गुप्ता व विपुल शर्मा ,समाज सेवी भूपेन्द्र ठाकुर,सोमकृष्ण गौतम,तेजराम गौतम,खूबराम गौतम,डोलाराम शास्त्री,अध्यापक देवी सिंह और बाग गांव की पंचायत समिति सदस्या तारा गौतम,बखोल गांव के गौरव,वार्ड सदस्य नारायण सिंह,जोडने के समाज सेवी दिवाकर चौहान का कहना है कि आधुनिकता की चकाचौंध ने किसानों के पुराने जमाने से मनोरंजन का साधन रहे बांठड़ा, करयाला,प्रैहतों का नामोनिशान मिटा दिया है।आज की यु्वा पीढ़ी इस अमूल्य विरासत के नाम से भी परिचित नहीं है।अब सुकेत की इस सांस्कृतिक विरासत बांठड़ा, करयाला के कलाकार भी नहीं रहे।ऐसे में समृद्ध पहाड़ी संस्कृति के पतन का अहसास सहज ही होने लगता है।इन सब का मानना है कि भाषा कला संस्कृति विभाग को बांठड़ा की इस विधा को पुनर्प्रतिष्ठापित करने के साथ हर उस गांव के युवाओं को, जहाँ आज भी प्रैहते होते हैं वहां बांठड़ा को पुनर्जीवित कर इस समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा एवं संवर्धन का संकल्प लेना चाहिए।अन्यथा लोकनाट्य बांठड़ा के मंचन के बगैर प्रैहते एक रस्म बनकर रह जाएंगे।

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