कुल्लू

भगवान रघुनाथ ने कुल्लू में किया होली का आगाज

भगवान को 40 दिन लगाया जाता है गुलाल, गाए जाते हैं ब्रज के होली गीत : मोहर सिंह पुजारी

स्वतंत्र हिमाचल

(कुल्लू)सुरेश भारद्वाज

 

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में 40 दिन पहले होली का अनोखा और अविस्मरणीय आगाज मंगलवार को हो गया। हालांकि इस बार होली पर्व 29 मार्च को है, लेकिन देवभूमि कुल्लू में चालीस दिनों तक होली मनाई जाएगी। इस अद्भुत परंपरा का आगाज भगवान रघुनाथ जी ने भव्य शोभायात्रा के साथ मंगलवार को वसंत उत्सव की बेला पर किया। कुल्लू में वसंत पंचमी से लेकर 40 दिनों तक होली मनाई जाती है। भगवान रघुनाथ जी को हर दिन गुलाल लगाया जाता है। इन 40 दिनों में ब्रज की होली के गीत भी गूंजते रहेंगे। वसंत उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं को दर्शन देने के लिए भगवान रघुनाथ सुल्तानपुर स्थित अपने मंदिर से पालकी में बैठकर सैकड़ों भक्तों के साथ रथ मैदान तक पहुंचे और फिर यहां से रथ में सवार होकर अस्थायी शिविर तक पहुंचे।


इसी बीच वसंत के साथ-साथ शोभायात्रा के साथ भगवान रघुनाथ ने होली उत्सव का आगाज भी किया। भगवान रघुनाथ की इस रथयात्रा के दौरान राम-भरत मिलन आकर्षण का केंद्र रहा। रथयात्रा के शुरू होने से पूर्व हनुमान अपने केसरी रंग के साथ लोगों के बीच गए। श्रद्धालुओं का केसरी नंदन के साथ स्पर्श हो, इसके लिए श्रद्धालु उनके पीछे भागते हैं। मान्यता है कि जिन लोगों को हनुमान का केसरी रंग लगता है, तो उनकी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।  इस मौके पर अधिष्ठाता को देव विधि से गुलाल फेंका गया। गुलाल फेंकते ही कुल्लू में होली का आगाज हो गया। 40 दिन तक भगवान रघुनाथ को सुल्तानपुर स्थित मंदिर में हर रोज गुलाल लगाया जाएगा, जिसमें वैरागी समुदाय की अहम भूमिका रहती है। वसंत उत्सव में भी इसी समुदाय से एक व्यक्ति हनुमान का रूप धारण करता है। इसके बाद यहां भरत मिलन की भी परंपरा निभाई गई। (एचडीएम)
पहली बार मास्क पहन मनाया वसंत पर्व
इतिहास में पहली बार कुल्लूवासियों ने मुंह पर मास्क पहनकर बसंत पर्व को मनाया। कोरोना के चलते इस बार लोगों के लिए मास्क पहनना जरूरी है। वसंत उत्सव में भी सभी लोग मास्क पहने हुए ही दिखे। वहीं, श्रद्धालुओं ने भगवान रघुनाथ जी के दर पहुंचकर भगवान  से कोरोना बीमारी के खात्मे की भी अर्ज की। भगवान रघुनाथ जी के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि इस देवभूमि में पांच उत्सव महत्त्वपूर्ण  हैं, जिनमें विजय दशमी, वसंत पंचमी, जल विहार, वन विहार और होली का दहन उत्सव शामिल हैं। चालीस दिनों तक होली की परंपरा को निभाया जाएगा। इस उत्सव में वैरागी समुदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

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