बीते जमाने की बात लगने लगे कांगड़ा के छिंज मेले

 

(कांगड़ा)मनोज कुमार

2 साल पहले की बात करें तो आजकल समूची कांगड़ा घाटी छिंज मेलों के आयोजन से सराबोर होती थी। कोरोना महामारी की दहशत और प्रशासन की पाबंदियों ने जैसे सब कुछ छीन लिया हो। मेले, त्यौहार और धार्मिक आयोजन जैसे बीते जमाने की बातें लगने लगीं हैं। मेलों में जहां बच्चे व महिलाएं खेल खिलौने खानपान और मनोरंजन का सामान अपने गली मोहल्ले में पाकर झूम उठते थे, वहीं बूढ़े और जवान छिंज मेलों में होने वाली कुश्तियों में देश के नामी-गिरामी पहलवानों के दांव पेंच देखकर फूले नहीं समाते थे।

कांगड़ा के गांव व नगरों में आयोजित होने वाले हर मेले का अपनी आस्था एवं इतिहास होता है। इनमें से कुछ मेले ऐतिहासिक और कुछ नये शुरू किए गए होते हैं। कांगड़ा के कुछ प्रसिद्ध मेलों की बात की जाए तो लिदबड़ मेला, सल्याणा छिंज मेला, दाड़ी का प्रसिद्ध मेला, शाहपुर, चम्बी के मेले, मटौर और कांगड़ा की छिंज, दौलतपुर का ऐतिहासिक बाबा दयालगिरी छिंज मेला, जलाड़ी व जनयानकड़ के मेले, चौंधा, बलोल, सुन्ही, ठाना बड़ग्रां एवं सरोत्री के छिंज मेले प्रमुख तौर पर याद किए जा रहे हैं। इन मेलों में आजकल झंडा रस्म के साथ छोटे बच्चों की दो चार कुश्तियां औपचारिकतावश करवाई जा रही हैं। लोग ईश्वर से दिन रात प्रार्थना कर रहे हैं कि महामारी का ये वक्त बीत जाए और समृद्ध संस्कृति के प्रतीक मेलों का दौर फिर से लौट आए।

 

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