प्रतिदिन मिड डे मिल योजना के पैसे से बच्चों को दिए जा सकते थे एंडरॉयड फोन,लैपटाँपस,व फ्री डाटा इंटरनेट : कुलदीप चम्बयाल

स्वतंत्र हिमाचल

(धर्मपुर )डी आर कटवाल

कोरोना आपदा के दौरान अव्यवहारिक हुए मिड डे मिल के पैसे ( जो लगभग रू 2892962/-प्रति दिन ) से हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बच्चों के लिए फ्री इंटरनेट डाटा और एंड्रॉयड फ़ोन, टेबलेट्स और लैपटॉपस दिये जा सकते थे
यहाँ जारी एक प्रैस विज्ञप्ति में धर्मपूर पंचायत समिति के पूर्व अध्यक्ष कुलदीप सिंह चम्बयाल ने कहा कि मिड डे मील जैसी उम्दा योजना वर्तमान कोरोना के परिदृश्य में अव्यवहारिक सी हो चुकी है,जबकि बच्चे स्कूल ही नहीं जा पा रहे हैं और दोपहर का खाना वह घर पर ही खा लेते हैं, लेकिन ऐसी कोविड 19 पेंडेमिक के दौर में स्कूली बच्चों को दोपहर के भोजन की वनस्पति इंटरनेट डाटा और एंड्रॉयड फ़ोन, टेबलेट्स और लैपटॉपस की ज्यादा आवश्यकता है।


कुलदीप सिंह चम्बयाल ने कहा कि अगर सरकारी आंकड़ों का अध्ययन किया जाए तो साफ दिखता है कि हिमाचल प्रदेश में प्राथमिक पाठशालाओं में प्रदेश में 2,90,158 छात्र पढ़ते हैं और उनको प्रतिदिन 4.90 पैसे के हिसाब मिड डे मील का पैसा मिल रहा है। यदि मिडल स्टैंडर्ड की बात करें तो प्रदेश में कुल छात्र 1,97,475 है और उनको प्रतिदिन 7.45 रुपये के हिसाब से मिड डे मील के पैसे का आबंटन किया जा रहा है जो कि वर्तमान कोविड 19 पेंडेमिक के चलते अव्यवहारिक है। यदि इन आकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो प्रदेश प्राथमिक छात्रों के 14,21,774 रुपये और मिडल स्तर पर 14,71,188 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दिया जा रहा है। जो कि करीब 28,92,962 रुपये प्रतिदिन बनता है।

कुलदीप सिंह चम्बयाल ने कहा कि यदि यही पैसा इन बच्चों के लिए इंटरनेट डाटा और टेबलेट खरीदने के लिए बच्चों को दिया जाता तो इन बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से हो सकती थी। इसी पैसे से बच्चों को 10 से 12 इंच के टैबलेट दिए जा सकते थे और इसमें इनको करीब 10 से 12 टेराबाइट इंटरनेट डाटा प्रतिमाह उपलब्ध भी करवाया जा सकता था।
कुलदीप सिंह चम्बयाल ने कहा कि बात यहीं पर खत्म नहीं होती प्रदेश में 25000 रुपये प्रति स्कूल सेनेटाइज़ेशन के लिए दिए गए जिनमे 1250 लीटर सेनेटाइज़ेशन कॉन्संट्रेटर खरीदा जा सकता है और करीब 18000 लीटर में कनवर्ट किया जा सकता है लेकिन जब स्कूल ही बंद हैं तो यह फैसला भी अव्यवहारिक है। इसके अलावा 20 रुपये प्रति छात्र को हाथ धोने के लिए साबुन के लिए पैसे दिए गए जिसमे करीब 7 लाख स्कूली बच्चों पर 1 करोड़ 40 लाख रुपये की फिजूलखर्ची की गई। बात यहीं पर भी नही थमी प्रदेश के हर स्कूल को 90 रुपये प्रति प्लेट या थाली खरीदने के मिड डे मील के लिए दिए गए जिसमें करीब 4 करोड़ 39 लाख रुपये की अवव्यहारिक खर्च प्रदेश सरकार के द्वारा किया गया।

जबकि यह पूर्ण रूप से कोविड19 का बहाना लेकर फिजूल खर्चा और अवव्यहारिक खर्च किया गया और इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि कितनी ही सेनेटज़र, मास्क और ग्लोव्स बनाने वाली फर्मे कुकरमुत्तों की तरह उग कर सरकार की गोद मे बैठ गई हैं। यदि कोविड 19 पेंडेमिक की बुनियादी जरूरत को प्रदेश के शिक्षा मंत्री, प्रदेश की शिक्षा सचिव और निदेशक समझते तो इन छात्रों को टेबलेटस के साथ साथ पढ़ाई के अच्छा खासा इंटरनेट डाटा उपलब्ध करवाया जा सकता था,

क्योंकि आज की प्रासंगिकता के आधार पर मिडडे मील से जरूरी छात्रों को इंटरनेट डाटा और एंड्रॉयड फोन या 10 से 12 इंच के टेबलेटस की ज्यादा आवश्यकता है क्योंकि वह बच्चे घर पर रह कर अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सके और दोपहर का भोजन तो इन बच्चों को स्वाभाविक तौर पर घर मिल ही रहा वैसे भी 4.90 रुपये और 7.45 रुपये प्रतिदिन मिडडे मील में पैसा देना आज कोविड 19 पेंडेमिक के दौर में असहज है।सरकार इस आपदा के समय भी अमीरों की हितैषी बनी है और गलत फैसलों से गरीबों को और गरीब बना रही है जो निंदनीय है।

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