आयुर्वेदिक चिकित्सक कर सकेंगे सर्जरी : डॉक्टर विक्रमादित्य

स्वतंत्र हिमाचल

(अंब)अविनाश

 

अंब अविनाश आजादी के 70 वर्ष बाद मिले ऐतिहासिक सम्मान से आयुर्वेद जगत बेहद उत्साहित है। अब तक शल्य (सर्जरी) केवल आधुनिक चिकित्सा को ही मान्य थी। आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा के बारे में हिमाचल आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ.विक्रमादित्य गौतम ने बताया कि चिकित्सा जगत की प्राचीनतम भारतीय विद्या है शल्य चिकित्सा।

जिसका दुनिया में कोई सानी नहीं है,परंतु लम्बी गुलामी और शासन की उदासीनता ने ही आयुर्वेद में सर्जरी को सर्वोच्च स्थान नहीं दिया। जबकि शल्य (सर्जरी)के मुख्य प्रवर्तक महर्षि सुश्रुत जी ने इसे चिकित्सा के प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किया है। आयुर्वेद में शल्य(सर्जरी)की पूर्ण विधि वर्णित है लेकिन आजादी के बाद इसे जो प्रधानता मिलनी थी उससे ये अछूती ही रही।

आधुनिक एलोपैथी मेडिसिन रोगों के मूल पर आघात न करके केवल उसे कुछ काल के लिए दबाने का काम करती है और साथ में कई प्रकार के दुष्प्रभाव भी छोड़ जाती है। लेकिन आयुर्वेद रोगों के कारण पर वार करता है और रोग को कारण सहित नष्ट करता है। इसके दुष्प्रभाव भी नगण्य है। फिर भी एलोपैथिक चिकित्सा को इतना सम्मान देना न केवल स्वास्थ्य के किये घातक सिद्ध हुआ अपितु देश को भी अपनी प्राचीनतम विद्या जो कि सब चिकित्साओं की जननी भी है,उसके लाभों से वंचित रहना पड़ा है।

लेकिन अब भारत सरकार के इस क्रांतिकारी ऐतिहासिक निर्णय से अब तक जिन प्रतिभाओं को अपना सर्जरी के क्षेत्र में चिकित्सा कौशल दिखाने का अवसर नहीं मिला था अब वे सब भी अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ बन मानवता की सेवा कर सकेंगे। निश्चित ही ये आयुर्वेद जगत के लिए गौरव करने का समय है। मैं इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए हिमाचल आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी परिषद के समस्त पदाधिकारियों,सदस्य साथियों ओर डॉक्टर्स की ओर से भारत सरकार का हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ।

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