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आत्म निर्भर भारत ही महिला सशक्तिकरण की पहचान

आज महिलाएं समाज को विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। समाज महिलाओं के सक्रिय योगदान के बिना नहीं बनाया जा सकता। आज महिलाओं के अदृश्य संघर्ष को सलाम करने के लिए, उन्हें समान अधिकार और सम्मान दिलाने के उद्देश्य से हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। भारत में महिला सशक्तिकरण कई अलग-अलग चर पर निर्भर करता है जिसमें शामिल हैं, हमारी संस्कृति और हमारी भौगोलिक स्थिति। नीति निर्माण और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच अंतराल सामुदायिक स्तर पर महिलाएं तभी सशक्त हो सकती हैं जब वे साक्षर हों और शिक्षित हों क्यूकी शिक्षा, सुनहरे दरवाजे को खोलने की कुंजी मानी गई है हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार 84.7% पुरुषों के मुकाबले में 70.3% महिलाएं ही साक्षर हैं। साक्षर होना या केवल प्राथमिक शिक्षा का होना या उत्पादकता बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है या बेहतर-भुगतान वाली नौकरियों को प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है उच्च शिक्षा।

दुषमा ठाकुर (ख़ुशी) पीएचडी शोधार्थी, लोक प्रशासन विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय।

शिक्षा किसी भी नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता और मौलिक अधिकार है। यह व्यक्ति की मदद करता है अन्याय तथा असमानता को कम करने और मानव विकास में एक केंद्रीय भूमिका निभाता हैं जो समग्र सामाजिक आर्थिक विकास को प्रभावित करता है। साक्षरता और शिक्षा का उच्च स्तर स्वास्थ्य, पोषण की स्थिति, आर्थिक विकास, जनसंख्या नियंत्रण, कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण और समग्र रूप से समुदाय की बेहतर प्राप्ति की ओर ले जाता है। दशकों से इस संदर्भ में समाज महिलाओं को कोई अधिकार दिए बिना विकास करने की कोशिश कर रहा है। हमेशा से महिलाओं के विकास के प्रति लैंगिक भेदभाव देखा गया। हमारे समाज में पुरुषों को सशक्त किया जाता है और महिलाओं को उनका सेवक माना जाता है साथ ही महिलाओं के पास अपने अधिकार नहीं हैं और न ही किसी भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र माना जाता है।समाज में महिलाओं को समान दर्जा प्रदान करने के लिए महिलाओं को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है तथा सशक्तिकरण ज्ञान और जागरूकता प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है जो उन्हें अधिक गरिमा और आत्म आश्वासन एवं अधिकारों के प्रति जागरूकता, व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन पर नियंत्रण और उनकी क्षमता को शामिल करता है साथ ही जीवन की ओर बढ़ने में सक्षम बनाती है जो समाज में एक बदलाव भी हैं।सामाजिक सशक्तीकरण का अर्थ है समाज में स्त्री को अन्याय और असमानता की स्थिति को समाप्त करके पुरुष के मुकब्ल देखें। हालाकि आज भी हमारे देश में महिलाएँ निस्वार्थ प्रेम से अपने परिवार, समाज और देशों में आर्थिक रूप से योगदान देती है। यह देश का विकास न केवल मानव संसाधनों के आधे विकास में मदद करता है, बल्कि सुधार में भी मदद करता है। घर और बाहरी जीवन की गुणवत्ता केवल आर्थिक निर्भरता से नारी सशक्तिकरण सम्भव नहीं है अगर केवल आर्थिक निर्भरता से नारी सशक्त हो सकती तो वो तथ्य भी झुठलाया नहीं जा सकता तो विश्वसुंदरी युक्तामुखी” को कभी भी पुलिस की शरण नहीं लेनी पड़ती जो की स्वयं करोड़ों की मालकिन है।
महिला सशक्त तभी हो सकती है जब वह सर्वांगीण रूप से आत्म निर्भर हो अर्थात आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ -साथ शारीरिक निर्भरता, मानसिक आत्म-निर्भरता, शैक्षिक आत्म-निर्भरता इत्यादि से सम्पूर्ण रूप से सर्वांगी हों। हालाकि आज भी हमारे समाज में बाल्य-काल से ही बालिकाओं के मस्तिष्क में डाला जाता है कि वह कमजोर है,कोमल है, कठिन कार्य बालिकाओं के वश में नहीं होता, इन बातों को बार-बार लड़कियों के दिमाग में डाले जाने से लड़कियां अपने आप को कमजोर समझने लगाती हैं। और फिर सशक्तिकरण से कोसों दूर चली जाती हैं।
सशक्त नारी के कुछ उदाहरण के रूप में हम अनेकों महिलाओं के जीवनी पर प्रकाश डाल सकते है जो केवल आर्थिक आत्म-निर्भर ही नहीं हैं बल्कि उन्होंने समग्र रूप से आत्म-निर्भरता में इतिहास रचा है।
जिनसे आज की पीढ़ी अथाह प्रेरित होती हैं।अतः नारी सशक्तिकरण सर्वांगीण आत्म-निर्भरता से ही सम्भव है, जो की सशक्तिकरण शक्ति से सम्भव होता है। मां दुर्गा कि तरह जब महिलाएं पापियों को दंड देने की शक्ति अर्जित करेंगी तो स्वतः ही महिलाएं सशक्त हो जाएँगी। आज असंख्य महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होते हुए भी विविध रूप से अशक्त हैं। परिणामतः पीड़िता हो जाती हैं, यहीं अगर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ -साथ शारीरिक रूप से सशक्त हों तो निश्चित रूप से पापियों को पाप करने का अवसर ही नहीं मिलेगा, फिर भी अगर कुछ हुआ तो सशक्त महिलाएं उन्हें तत्क्षण ही दण्डित करसकती हैं न कि तथाकथित अबला नारी की तरह व्यथित हो कर घुट-घुट कर मरेंगी।
हाल ही में गुजरात के अहमदाबाद में लड़की पति के कारण मानसिक तनाव में आकर अपनी जिंदगी को अलविदा छोटी सी उम्र में कर गई। यह केवल एक मामला नहीं है, हमारा समाज, जहां पुरुष अपने अनुचित विशेषाधिकार को जानते हुए बड़े होते हैं और महिलाओं को सिर्फ़ घर संभालने वाली समझते है। दूसरी ओर महिलाएं यह जानकर कि वे दूसरे दर्जे की नागरिक है। यह बहुत दिल तोड़ने वाला है, यहां तक कि उस समय उसके माता-पिता भी चिंतित थे कि अन्य लोग क्या सोचेंगे? महज़ चंद मिनटों में हस्ती खेलती जिंदगी हार गई। पूरे देश के लिए प्रश्नचिन्ह लगाकर अपनी हस्ती मिटा गई। इस तरह मानसिक अस्वस्थ रूप के लोगों को ये जानना होगा, आज की महिला राष्ट्र निर्माता है।
श्रीमती इंदिरा गांधी कितनी शक्तिशाली थीं मात्र आर्थिक निर्भरता के कारण नहीं , मानसिक रूप से सशक्त होने के कारण भी,” मेरे जुनूं का नतीजा जरूर निकलेगा, इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा,” ये शब्द असम की हिमादास” के लिए है जिन्होंने अपनी छोटी सी उम्र से दुनियां भर में इतिहास रच दिया और आज असम सरकार में डीएसपी पद पर विराजमान हैं।असम के एक छोटे से गांव कांधूलिमारी (नगांव जिला) में जन्मी हिमा को यूं ही नहीं इस पद पर विराजा गया इसके लिए उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बहुत सारी महिलाएं विख्यात हैं क्योंकि वे सर्वागीण सशक्ति कारण की द्योतक हैं। अपनी क्षमता के कारण एक दौर ऐसा भी था जब भारत के महत्वपूर्ण पद पर महिलाएं सुशोभित थी। यथा राष्ट्रपति महिला , ये सभी महिलाएं अपनी क्षमता के कारण देश को गौरवान्वित करती रहीं हैं। आज कोई भी क्षेत्र हो महिलाएं सर्वत्र अपना परचम लहर रहीं हैं।अपनी मज़बूत इरादों से क्योंकि वे सशक्त हैं। सर्वत्र यह प्रमाणित किया है कि वे मिसाल हैं सशक्त हैं, कर्मठ हैं. परन्तु यह ताकत उन्हें केवल आर्थिक निर्भरता के वज़ह से नहीं मिली है वरन सर्वांगीण सशक्तिकरण के माध्यम से वे इस शिखर पर पहुँच पायीं हैं।
आत्मनिर्भर भारत का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक महिलाएं सशक्त नहीं बनतीं। उनके सशक्तिकरण के लिए उनको आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। इसके लिए सरकार तो ढेर सारी योजनाएं लागू करती है, लेकिन निचले स्तर पर उनको बेहतर ढंग से अमलीजामा नहीं दिया जाता। यहीं कारण है आज भी महिला-पुरूष को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाया है। सरकार की योजनाओं की ही देन है कि जहां महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलती थी, वो अब बैंकों के खातों का संचालन भी खुद ही करती है। सरकारी विभागों में अधिकारियों से मिलने, खरीददारी करने या अन्य कामों में आगे आने लगी है। यहां उदाहरण के तौर पर सरकार की स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना को भी लिया जाता है। इस योजना के तहत अनेक ऐसी महिलाएं आत्मनिर्भर बनी है, जिनको पहले दो जून की रोटी नसीब करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन आज तो समाज की मुख्यधारा में शामिल है। इससे जुड़ी महिलाएं आत्मनिर्भरता के साथ अच्छा जीवन यापन कर रही है। इसे सही मायने में महिला सशक्तिकरण की संज्ञा दी जा सकती। केद्र सरकार द्वारा चलाई गई जनधन योजना का महिला सशक्तिकरण में अहम योगदान रहा है। कुल 38 करोड़ नए बैंक अकाउंट खुले और इनमें से 20 करोड़ अकाउंट्स महिलाओं के नाम पर हैं। यही नहीं मुद्रा योजना के तहत जिन लोगों को इसका लाभ होगा, उनमें 75 परसेंट महिलाएं हैं। इस समय जरूरत है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियां टेक्नोलॉजी, साइंस, मैथ्स और रिसर्च के फील्ड मे जाएं और अपनी स्किल को बढ़ाकर कामयाबी की ऊंचाइयों को छू सके। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना भी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काफी कारगर साबित हो रही है। जिसके कारण महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में सफल रही।
कोविड-19 ने हमें खुद के अंदर झांकने का मौका दिया है, ताकि हम अपनी संस्कृति के तरीकों को अपनाकर अपनी इम्युनिटी को बढ़ा सकते हैं। ‘एक्ससेस टू कैपिटल’ और ‘एक्सेस टू स्किल’ ऐसे दो एरिया हैं, जिनमें कि महिलाओं को जागरुक करने की जरूरत है। महिलाएं सशक्त हैं, लेकिन जरूरत पुरुषों के माइंडसेट को बदलने की है। महिलाएं हमेशा से ही बेहतरीन तरीके से विभिन्न जिमेदारियां निभाती आ रही हैं। वे अपने परिवार और काम को एकसाथ बेहतर तरीके से संभालती हैं।
अतः अगर महिलाओं को केवल ‘महिला दिवस’ मना लेने भर से संतुष्टि मिले तो शायद यह बेमानी होगा। हमें महिलाओं को सशक्त बनाने की ज़रुरत है। इसके लिए बचपन से लड़कियों को हर क्षेत्र में सहभागिता देने में उनको सहयोग करना होगा ताकि आने वाले समय में आत्मनिर्भर बनकर अपने जज़्बे को मजबूत करें और श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो सके।
मैं तो यह भी प्रस्ताव देना चाहूंगी कि महिला दिवस में ‘महिला सशक्तिकरण दिवस’ मनाया जाना चाहिए।

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