मौलिक अधिकारों को छीन रही जय राम सरकार

कर्मचारियों की आवाज़ दबाना लोकतंत्र की हत्या

हक़ के लिए बोलना गुनाह बनाया जयराम सरकार ने-भूपेंद्र
ओल्ड पेन्शन योजना की मांग उठाना सही

(सरकाघाट)रितेश चौहान


हिमाचल प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग के निदेशक ने 17 अप्रैल को जारी पत्र के माध्यम से उन कर्मचारिओं की सूची बनाने का फ़रमान जारी किया है जो अपनी मांगों के बारे मीडिया व सोसल मीडिया में सरकार के ख़िलाफ़ बयान जारी कर रहे हैं।माकपा नेता व पूर्व ज़िला परिषद सदस्य भूपेन्द्र सिंह ने सरकार के इस फ़रमान की आलोचना व निंदा की है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है और अपनी मांगों के बारे आवाज़ उठाने को तानाशाही तरीके से दबाने वाला फैसला है।

भूपेंद्र सिंह ने बताया कि पिछले दिनों से सरकारी कर्मचारी ओल्ड पेंशन स्कीम को बहाल करने और कोरोना संक्रमण की रोकथाम बारे सरकार के कई फैसलों के बारे मांग कर रहे हैं और मीडिया में भी बयान दे रहे हैं।भाजपा ने सत्ता में आने से पहले कर्मचारिओं से ये वादा किया था कि वे सत्ता में आते ही पुरानी पेंशन योजना को लागू करेंगे लेक़िन सरकार के साढ़े तीन साल पूरे होने जा रहे हैं और अब वे इस बारे चुप्पी साध रखी है जिस कारण वर्ष 2003 के बाद लगे कर्मचारिओं ने आंदोलन शुरू किया है।

कर्मचारिओं को इस 15 अप्रैल को हिमाचल दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री की ओर से घोषणा होने की उमीद थी लेकिन मुख्यमंत्री ने इस बारे कुछ भी नहीं कहा और वहां विपक्षी दलों को खाल में रहने की धमकियां देते रहे लेक़िन प्रदेश के लाखों कर्मचारिओं की ओल्ड पेंशन योजना बारे घोषणा की आस पर पानी फ़िर गया है।अब इसके लिये आवाज़ उठाने वालों की आवाज़ दबाने के लिए आदेश जारी कर दिया गया है जो इस सरकार की कर्मचारी विरोधी नीति का ही प्रमाण है।भूपेंद्र सिंह ने भाजपा सरकार पर ये भी आरोप लगाया कि इसी पार्टी के समय वर्ष 2003 में कर्मचारियों की पेंशन बन्द करने का कर्मचारी विरोधी निर्णय लिया था और अब इसी पार्टी द्वारा रैगुलर के बजाये औटसोर्सिंग की नीति लागू करके रोज़गार ख़त्म कर दिये हैं।पिछले साढ़े तीन साल से जयराम की सरकार ने कर्मचारियों के संगठनों के साथ कोई मीटिंग नहीं बुलाई है और न ही सयुंक्त सलाहकार समिति की मीटिंग बुलाई है।जो कर्मचारी संगठन पहले सरकारों के ख़िलाफ़ धरने प्रदर्शन किया करते थे वे भी आज़कल मूक दर्शक बने हुए हैं और सरकार की गोद में बैठे हैं। ऐसे कर्मचारी नेता अपने निजी फायदे के लिए अन्य सभी कर्मचारियों को एकत्रित करके मुख्यमंत्री को सम्मानित करते हैं लेकिन कर्मचारियों के हितों की पैरवी तक नहीं कर पाते। ऐसे कर्मचारी नेता ही सरकार के पास अन्य कर्मचारियों की चुगली लगाकर उन्हें प्रताड़ित करवाते हैं। ये सरकार के पिट्ठू बन बैठे हैं और जो अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं उन्हें इस तरह के फरमान जारी कर दबाया जा रहा है।लेकिन कुछ मज़दूर यूनियनें जो सरकार की नीति का विरोध करने की हिम्मत कर भी रहे हैं उनकी आवाज़ दबाने के फ़रमान अब जारी किए जा रहे हैं।कुछ शिक्षक संघों ने स्कूलों को बन्द रखने औऱ परिक्षयायें स्थगित करने के फ़ैसले बारे भी सरकार को सुझाव दिए हैं जो उन्हें उचित नहीं लगे हैं और अब उनकी जवान बन्द करवाने के लिए इस प्रकार के तुग़लकी फ़रमान जारी किए जा रहे हैं जिनका सभी को विरोध करना होगा।माकपा नेता ने पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मांग का समर्थन किया है और कर्मचारियों को डराने धमकाने वाले आदेशों की कड़ी निंदा की है।

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