प्रकृति का फल काफल कोरोना काल में लोगों की पहुंच से हुआ दूर


स्वतंत्र हिमाचल

(धर्मपुर) डी आर कटवाल


ज्येष्ठ माह की कड़कड़ाती धूप में तैयार होते हैं काफल के फल।बता दें कि गर्मियों का मौसम आते ही प्रकृति की सौगात काफल की फसल तैयार होते ही मंडियों में आ जाती थी। परन्तु कोरोना की घातक महामारी के चलते अब कमोबेश ही मंडियों में दिखाई देती है । यदि मंडी जिला की बात करें तो काफल के पेड़ तुंगल और मौवीसेरी के जंगलों में काफी मात्रा में पाए जाते हैं । आज कल जहां मंडी के चौहाट्टा बाजार में काफल के ढ़ेरों को देखते ही खाने के लिए मन ललचाता था ।

वहीं पर कुदरत के इस तोहफे को काफी गुणकारी बताया जाता है विशुद्ध रूप से रासायनिक खादों से दूर,इस फल के सेवन का मजा ही कुछ और है । पर कोरोना की मार इन फलों पर भी पड़ी है । यहां इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि ग्रामीणों की आय का साधन काफलों को टोकरियों में भरकर बाजार में बेचना था । पर कोरोना का संकट गांव की जनता पर भी भारी पड़ा है अन्यथा बड़े शहरों के अलावा गांव के कस्बों में भी काफल बेचा जाता था । यदि हम विगत की ओर झांकें तो उस समय भी लोग बीहड़ जंगलों में रोटी बांधकर काफल चुगने जाते थे और गांव गांव में जाकर काफल बेचते थे पर उस वक्त लोगों के पास पैसे का अभाव होने पर बदले में अन्न के दाने लेकर ही संतोष करना पड़ता था जबकि वर्तमान में काफल के अच्छे दाम मिल पाते हैं । गांव के लोग तो पिछले साल से ही काफल के दीदार के लिए तड़प रहे हैं

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