लड़भड़ोल

अवैज्ञानिक दोहन के कारण खतरे में है पौष्टिक तत्वों से भरपूर जंगली कंद ‘तरड़ी’


शिवरात्रि व होली पर्व में घरों में बड़े चाव के साथ पकाई जाती है तरड़ी की सब्जी

(लड़भडोल)लक्की शर्मा


शिवरात्रि तथा होली पर्व के दौरान हमारे घरों में बड़े चाव के साथ परोसी जाने वाली जंगली कंद तरड़ी की महक बीते वक्त के साथ लगातार कम होती जा रही है। हमारे ग्रामीण परिवेश में रंगो के त्यौहार होली पर्व के वक्त लोग घर में आने वाले मेहमानों को देसी पकवानों के साथ तरड़ी की सब्जी को आमतौर पर परोसते हैं। लेकिन अवैज्ञानिक व अंधाधुंध दोहन के चलते अब पोष्टिक तत्वों से भरपूर यह जंगली कंदमूल तरड़ी लगातार हमारे भोजन से गायब होती जा रही है। हिमाचल प्रदेश में सर्दियों के मौसम में तरड़ी की सब्जी आम मिल जाती थी।

बाजार में भी तरड़ी की महक देखने को मिलती थी, लेकिन अब बाजार में भी तरड़ी की आवक में कमी देखी जा रही है। ऐसे में प्राकृतिक तौर पर पाई जाने वाले इस जंगली कंद को न केवल व्यावसायिक तौर पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है बल्कि इसके अवैज्ञानिक दोहन को लेकर भी जन जागरूकता लाने की जरूरत लग रही है।
तरड़ी नामक यह कंद खाने में स्वादिष्ट होने के साथ-साथ अति बलवर्धक व सेहत के लिए बहुत ही गुणकारी होता है। तरड़ी में बहुत ज्यादा मात्रा में जरूरी तत्वों के अलावा बिटामिन बी ग्रुप व फोस्फेट्स, कैल्शियम, जिंक, आयरन व क्रोमियम पाया जाता है।

यह प्राकृतिक तौर पर पैदा होने वाला कंद तरड़ी नामक आहार मनुष्य के शरीर के लिए बहुत ही गुणकारी होता है। यह कंद पूरी तरह से जैविक होने के कारण बाजार में इसकी खासी मांग रहती है तथा दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। वर्तमान में इसकी बाजार में औसत कीमत 150 से 200 रूपये प्रति किलो है।
तरड़ी नामक कंद मूल रूप से जंगल में प्राकृतिक तौर पर पैदा होता है। इसके पौधे बेलनुमा होते हैं तथा इस बेल के नीचे कंद के रूप में तरड़ी नामक कंद पाया जाता है। जिसे सब्जी या चाट बनाकर खाया जा सकता है। तरड़ी के बीज बेल पर ही लग कर बेल सूखने पर नीचे गिर जाते हैं। लेकिन इस जंगली कंद को किसान व्यावसायिक दृष्टि से तैयार करें तो उनके लिए आमदनी का एक अच्छा जरिया हो सकता है।

क्या कहते हैं अधिकारी


क्षेत्रीय निदेशक, क्षेत्रीय एवं सुगमता केंद्र उत्तर भारत, जोगिन्दर नगर डॉ. अरूण चंदन का कहना है कि जंगली कंद तरड़ी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है। तरड़ी के औषधीय गुणों के कारण इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। किसान तरड़ी को अपनी बेकार पड़ी जमीन या खेतों की मेड़ों में तैयार कर सकते हैं। तरड़ी नामक कंद हिमाचल प्रदेश सहित मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर इत्यादि राज्यों में भी पाया जाता है।

दक्षिण भारत में यह बहुतायत में पाया जाता है लोग इसे खूब पसंद करते हैं।
उनका कहना है कि प्रदेश के किसान तरड़ी को व्यासायिक खेती के तौर पर अपनाते हैं तो यह उनकी आर्थिकी को आश्चर्यजनक रूप से मजबूती प्रदान कर सकता है। सबसे अहम बात यह है कि जंगली जानवर भी इसे नुक्सान नहीं पहुंचा पाते हैं।

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