कोरोना के चलते पौराणिक दानों घाट मेला ना होने से स्थानीय लोगो मे मायूसी

(अर्की)कृष्ण रघुवंशी

उपमंडल अर्की की ग्राम पंचायत दानोघाट का 28 मई को होने वाला ऐतिहासिक प्राचीन मेला इस वर्ष भी कोविड19 के चलते सम्पन्न नही हो पायेगा।
यह मेला सैंकड़ों वर्षों से यहां के स्थानीय आराध्य देव श्री कुरगण प्रकाश जी के सम्मान में आयोजित किया जाता है। इस दिन यहां पर कुरगन देवता जी के चार स्थानों कोलका, कराड़ाघाट, संघोई औऱ मांगू से ढोल नगाड़े सहित चार रथ आते थे और उनके सम्मान में यहां पर देव जात्रा व मेला लगता था। इस मेले का आयोजन पिछले कई वर्षों से दानोघाट और कोटली पंचायत मिलकर करती है।


इस वर्ष भी कोविड के चलते केवल देवता जी के मंदिर में पूजारी केवल पूजा करेंगे और सभी ग्रामवासियों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करेंगे।
इस मेले के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए स्थानीय समाजसेवी जगदीश शर्मा ने बताया कि यह देवजात्रा राजाओं के समय से सैंकड़ो वर्षों से आयोजित की जा रही है। उन्होंने बताया कि सैंकड़ो वर्षो पहले देव श्री कुरगन प्रकाश जी का रथ के साथ उनके गुर और श्रद्धालु डुमैहर में जात्रा में जा रहे थे। उस दिन ज्येष्ठ माह के 14 प्रविष्टे थे। जब रथ अर्की नगर से होते हुए गुजरा तो उस समय के तत्कालीन राजा को उनके सलाहकारों द्वारा भड़का दिया गया कि ये देव जातरू देवता के नाम पर ढोंग करते है और कल इन्हें डुमैहर से वापिस आते हुए राजदरबार में बुलाकर इनकी परीक्षा की जाए। जब देव जातरू अगले दिन डुमैहर से वापिस आ रहे थे उन्हें राजा की आज्ञा हुई कि उन्हें राजा के दरबार मे उपस्थित होना पड़ेगा। उनके अर्की पहुंचने से पहले ही राजदरबार में कंटीली झाड़ियां और बड़े कड़ाहों में खौलता हुआ पानी रख दिया गया। जैसे ही देव जातरू वहां पहुंचे तो इस तरह का खौफनाक दृश्य देखकर देवता जी के गुर देवकला में आ गए और खौलते हुए पानी के कड़ाह में कूद गए, देखते ही देखते सब कुछ मिट्टी में परिवर्तित हो गया। देवकला में आये देव गुर ने राजा को चेतावनी देते हुए कहा कि राजन अब और क्या परीक्षा लेना चाहते हो ?
यह दृश्य देखकर राजा नतमस्तक होकर उनके श्रीचरणों में नाक रगड़ते हुए अपने किये की माफी मांगने लगे। उसके बाद दोनो पक्षों में समझौता हुआ कि राजा को हर वर्ष देवता जी के सम्मान में देवजात्रा का आयोजन करना होगा। कुछ दिनों बाद पुनः राजा के सलाहकारों ने राजा को सलाह दी कि क्यों न यह देवजात्रा अर्की राजमहल की जगह दानोघाट में आयोजित की जाए और उसका सारा खर्चा राजपरिवार वहन करेगा। उसके बाद राजपरिवार हर वर्ष इस मेले में स्वयं भी आता रहा और इसका सारा खर्चा भी देते रहे पर जब देश आजाद हुआ तो राजाओं के राज भी चले गए। उसके बाद इस देवजात्रा को मंदिर के श्रद्धालु ही आयोजित करने लगे और बाद में पंचायत ने भी इस मेले के आयोजन में अपनी सहभागिता देनी शुरू की और यह मेला जो सदियों से सभी की आस्था का केंद्र बना हुआ है और दूर दूर से श्रद्धालु यहां आकर देवता जी का आशीर्वाद भी प्राप्त करते है। हालांकि इस वर्ष भले ही कोरोना महामारी के चलते यह देवजात्रा अयोजित नही होगी पर लोगों की आस्था फिर भी देवता श्री कुरगन जी मे वैसी ही है और सभी इस बार भी सरकार और प्रशासन के दिशा निर्देशों का अनुपालन कर रहे है।

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