जम्मू कश्मीर

शीतला अष्टमी व्रत 04 अप्रैल रविवार को : महंत रोहित शास्त्री

शीतला अष्टमी का व्रत रोगों से मुक्ति दिलाता है।

(जम्मू कश्मीर)नरेश जमवाल

शीतला अष्टमी व्रत सन् 2021 ई. 04 अप्रैल रविवार को है,शीतला अष्टमी व्रत के विषय में श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री ने बताया शीतला अष्टमी का व्रत माता शीतला जी को समर्पित है। पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत चैत्र माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है। इस व्रत को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन माता शीतला जी को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। सप्तमी को माता का भोग तैयार करके कल 04 अप्रैल रविवार को माता शीतला को अर्पित करे।
माता शीतला जी को बासी भोजन का भोग लगाएं। उन्हें फूल,नीम के पत्ते और इत्र चढ़ाएं। कपूर से आरती करें और ऊं शीतला मात्रै नम: का जाप करें।
मान्यता है कि शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता,साथ ही ये अष्टमी ऋतु परिवर्तन का संकेत देती है. इस बदलाव से बचने के लिए साफ-सफाई का पूर्ण ध्यान रखना होता है. साथ ही यह भी माना जाता है पूजन का शुभ मुहूर्त 04 अप्रैल सुबह 06:16 से शाम 06:41 तक रहेगा।

शीतला अष्टमी के बाद से ग्रीष्मकाल की शुरूआत हो जाती है। माता शीतला जी ग्रीष्मकाल में शीतलता प्रदान करती हैं इसलिए उनको शीतल देने वाली माता कहा गया है। शीतला माता की पूजा करने से दाहज्वर, पीतज्वर, चेचक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्र विकार आदि रोग भी दूर होते हैं। यह व्रत रोगों से मुक्ति दिलाता है।

शीतला माता की आरती

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,
आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता।।
ऊं जय शीतला माता।
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता।
ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता।।
ऊं जय शीतला माता।
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।
वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता।।
ऊं जय शीतला माता।
इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता।।
ऊं जय शीतला माता।
घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता।
करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता।।
ऊं जय शीतला माता।
ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,
भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता।।
ऊं जय शीतला माता।
जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता।
सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता।।
ऊं जय शीतला माता।
रोगन से जो पीडित कोई शरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता।।
ऊं जय शीतला माता।
बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता।
ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता।।
ऊं जय शीतला माता।
शीतल करती जननी तुही है जग त्राता।
उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता।।
ऊं जय शीतला माता।
दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता ।
भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता।।
ऊं जय शीतला माता।

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