मानवता आज भी जिंदा है,सिद्ध कर दिया रौडी गांव के एक परिवार ने

 

स्वतंत्र हिमाचल(अर्की)कृष्णरघुवंशी

मानवता आज भी जिंदा है। यह सिद्ध कर दिया ग्राम पंचायत पलोग के ग्राम रोड़ी के एक सभ्रांत सवर्ण परिवार ने । जहां आज लोग पशुओ से सारा जीवन काम लेकर मरने के पश्चात नाले या सड़को के किनारे फेंक देते है वही रौड़ी ग्राम के मदन चौहान के परिवार ने उनके घर लगभग सत्तर वर्षो से कार्य करने हेतु रह रहे एक दलित का मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार स्वयं सवर्णो के श्मशान घाट पर किया।

शायद, आप यकीन न करें, लेकिन सच्चाई है कि 88 साल के कपूरूराम का अंतिम संस्कार मदन चौहान के दो बेटो ने पंकज चौहान व अजय चौहान ने पोते बनकर किया है। पहले तो गांव में इस बात को लेकर हल्की-फुल्की आपत्ति भी की गई कि उक्त दलित बुजुर्ग का दाहसंस्कार सवर्णो के श्मशान घाट की बजाय दलितों के लिए बनाये गए श्मशानघाट पर होना चाहिए, लेकिन जैसे-तैसे परिवार ने अपने तर्क देकर गांव को इस बात के मना लिया कि बुजुर्ग का अंतिम संस्कार वहीं होगा, जहां स्वर्ण समाज के लोगों का होता है।पश्चात 32 साल के पंकज चौहान व उनके भाई ने बुजुर्ग को मुखग्नि दी। उनका कहना है की वह पर रीति रिवाज के अनुसार घर पर 10 दिन का पिंडदान चल रहा है। इसके बाद हरिद्वार में धर्म क्रिया होगी। आखिर में मृत्यु के 15 दिन पूरे होने पर घर में धर्म शांति होगी। उन्हें (बुजुर्ग) हम परिवार का मुखिया मानते थे। अब परिवार के मुखिया के निधन पर जो रस्में होती हैं, वो निभाई जा रही हैं।

उनका कहना है कि 88 साल के कपूरूराम करीब एक साल से बीमार थे। इस दौरान शौच व मलमूत्र के लिए भी नहीं उठ पाते थे। पंकज, अजय व उनकी बहन अनु ने अंतिम समय पर शौच उठाने में भी कोई संकोच नहीं किया। तब से उन्हें परिवार में एक अलग सम्मान तो मिला ही, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी।एवम चौहान परिवार ने कपूरूराम के लिए घर निर्माण भी किया था उनके परिवार में कोई नहीं था। तीन बहनों का भरा पूरा परिवार है। तीन भांजे अंतिम संस्कार में आए, लेकिन अंत्येष्टि का अधिकार चौहान परिवार ने अपने पास ही रखा। क्षेत्र में चौहान परिवार के इस कार्य की भूरी भूरी प्रशंसा हो रही है।

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