काँगड़ा

पुराना कांगड़ा में प्राचीन कुएं व बाबड़ियां के सुधारीकरण की आवश्यकता

(कांगडा)मनोज कुमार

पूर्व में नगरकोट के नाम से और वर्तमान में पुराना कांगड़ा के नाम से इस प्राचीन शहर का उल्लेख, जहां पूर्व में लगभग दो दर्जन के आसपास गहरे शीतल पानी के कुएं हुआ करते थे और लगभग 12 से 14 की संख्या में सुंदर पक्की छत दार बाबड़िया हुआ करती थीं, जो उपेक्षा का शिकार होने के कारण और उपयोग में ना लाने के कारण या तो खराब हो चुकी है या उनका पानी पीने योग्य नहीं रहा है। पहले यही बावड़ियां और कुएं स्थानीय लोगों की प्यास बुझाते थे और जब यह सब उपयोग में लाए जाते थे, तब इनका आम जनता के श्रमदान और सहयोग से इनका उचित रखरखाव किया जाता था।

पूरे विश्व के वैज्ञानिकों द्वारा शोध करके यह जानकारी प्रकाशित की है कि भूमि पर जल का स्तर धीरे-धीरे काफी नीचे होता जा रहा है। इसमें बरसात का औसत से कम होना कारण बताया जा रहा है और अंधाधुंध पेड़ों का कटान तथा दिनों प्रतिदिन बढ़ रहे तापमान से पहाड़ों में शीघ्रता से पिघल रहे ग्लेशियर भी पानी की कमी का मुख्य कारण बनते जा रहे हैं। विगत वर्ष प्रदेश में भी बरसात का पानी कम ही बरसा है, जिसके कारण आने वाले गर्मी के मौसम में विकट पानी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। भविष्य में पानी की इस गंभीर समस्या को लेकर स्थानीय प्रशासन के समक्ष बिंदुओं पर प्रकाश डालना अति आवश्यक बन जाता है।

सरकारी पानी के नल आ जाने से अधिकतर परिवारों ने कुएं और बाबड़ियों से नाता ही तोड़ लिया है। जनता को पानी के इन अनमोल स्रोतों की आवश्यकता तब ही महसूस होती है, जब सरकारी पानी कई कई दिन नहीं आता है। स्थानीय प्रशासन जिसमें विशेषकर नगर परिषद और जल शक्ति विभाग को इन प्राकृतिक स्रोतों के बचाव हेतु अति शीघ्र कदम उठाने की आवश्यकता है। सर्वप्रथम शहर के इन सभी बाबड़ियों, कुओं को चयनित करके चरणबद्ध तरीके से साफ व पक्का किया जाए।

इसी क्रम में वार्ड-3 की पार्षद पुष्पा चौधरी ने नगर परिषद कांगड़ा की आर्थिक सहायता से घाट बाबड़ी और
परथयाली कुएं का कार्य करवाया था, जिससे दर्जनों परिवार इसका लाभ उठा रहे हैं। जल ही जीवन है, पानी है अनमोल, बूंद-बूंद बचाएंगे। जीवन सुरक्षित बनाएंगे, ऐसे अनेकों नारे स्लोगन तब ही सार्थक बनेंगे, जब आमजन और संबंधित प्रशासन इस और विशेष ध्यान देगा।

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