मंडी

अब कर्मचारियों और जनता की भी नही है खेर, भले ही सरकार खुद करे नए उड़न खठोले की महंगी सैर : जोगटा

(सरकाघाट)रितेश चौहान

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा करुणा फंड के लिए कर्मचारियों की एक एक दिन की तनख्वा काटने के फैसले की आम आदमी पार्टी ने कड़े शब्दों में निंदा की है आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एस्सार जनता द्वारा जारी प्रेस बयान में कहा कि
इससे पहले भी प्रदेश के कर्मचारियों एवम् पेंशनरों की 2020 के करोना लॉकडाऊन के दौरान प्रदेश सरकार ने एक एक दिन की सैलरी कटवाई थी।
वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा पक्षपाती रुव्या अपनाते हुए मुख्यमंत्री,मंत्री और विधायकों का उक्त सरकारी पत्र में उनसे उनकी तमख्वा कटवाने का कर्मचारियों के इलावा जानबूझकर कोई आदेश नहीं किए है।


जिस तरह सरकार ने आनन फानन में कर्मचारियों को उनकी तनख्वा कटवाने का तुगलकी फरमान जारी किया है वो अपने आप में सरकार का कर्मचारी हितेषी होने का दावा खोखला साबित तो करता ही है परंतु कर्मचारियों के हित में वर्तमान सरकार द्वारा किसी भी प्रकार के यहां तक की उनके जायज लाभ तक प्रदान नही किए जाने का भी सरकार पर आरोप है।
कर्मचारियों के दम से चलने वाली सरकार अर्थात सरकार के तमाम नीति और कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाने वाले कर्मचारी ही होते है।
कर्मचारी वर्ग सरकार को सता में लाने और उखाड़ने का भी मादा रखते है। जिसका आज तक का इतिहास भी गवाह है। प्रदेश आम आदमी पार्टी का मानना है कि अपने देश और प्रदेश के प्रति सभी को प्रेम और प्यार होता है और कर्मचारी और जनता भी उससे अछूते नहीं है। ये लोग प्रदेश हित में किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।।
लेकिन सरकार को भी तो उनके हित में एक एक कदम आगे आने की कोशिश करनी चाहिए।
करोना की आफत से निपटने की अगर बात करें तो आज भारत के प्रधानमंत्री केयर फंड में अरबों खरबों रुपए जमा हो रहे हैं । उसमें जो प्रदेश का हिस्सा बनता है वो क्यों नही मिल रहा है।जब की डबल इंजन वाली सरकार का राग अलापा जाता रहा है।वो जनता का पैसा किस मद के लिए रखा हुआ है।यदि वो फंड इस विकट घड़ी में काम नही आया तो उसका क्या फायदा?
इसी के चलते प्रधान मंत्री ने पिछली साल लॉकडोन के रहते देश हित में 20,लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी।उसका हिसाब किताब जनता को किसने देना है और कब देना है। जब की जनता आज मोताज है और पाई पाई के लिए त्रस्त है।
इतना ही नही प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री को प्रदेश की वित्तीय स्थिति का तब मालूम नही पड़ता है जब वो फिजूल खर्ची को प्रोत्साहन दे देते है।
जैसे कि हाल में ही प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री वास्ते रशिया से एक नया नवेला जहाज जिसका प्रति घंटे का खर्चा महज 5,10, 000.00.रुपए बैठ रहा है।मुख्यमंत्री महोदय जहाज का कराया दे सकते हैं। परंतु बाकी खर्ची के लिए जनता और कर्मचारियों से दान की भीख मांग रहे हैं।
दूसरी ओर जिस तरह से सरकारी स्तर पर फिजूल खर्ची का आलम है उसमे भी कोई पाबंदी नजर नही आ रही है।जब की होना तो ये चाहिए था कि मंत्रियों और अधिकारियों की गाड़ियां बंद करना और जितने भी खर्चे हो रहे हैं जो जनता के किसी काम के नहीं है उनको तुरंत प्रभाव से बंद करना। जहां तक प्रदेश के कर्मचारी होने का प्रश्न है।वो कर्मचारी होने के साथ-साथ देश व प्रदेश के नागरिक भी हैं। पार्टी का मानना है कि अगर सरकार अपने उपरोक्त फुलीजुल खर्ची समाप्त करने के उपरांत भी किसी कारण सरकार की स्थिति पटरी पर न होती तो निश्चित रूप से कर्मचारी ही नहीं बल्कि प्रदेश की जनता भी सरकार की मदद दिल खोल के उदारता से करने को बिना फरमान जारी किए बगैर आगे आते।
लेकिन अफसोस की यहां स्थिति इसके विपरित है।यहां कर्मचारियों को बिना पूछे तथा उनको किसी तरह के उनके जायज लाभों को अदा न करने के बजाए उनपर जबरदस्ती तुगलकी फरमान जारी करके उनकी तनखा कटवाई जा रही है।
जबकि दूसरी ओर मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री विधायकों तक के लिए उपरोक्त फरमान में उनकी तनख्वा कटवाने हेतु कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। क्योंकि वह पहले से ही गरीबी की रेखा से नीचे माने जाने लगे हैं।
आज तिथि यह है की उन कर्मचारियों की तनखा भी काटी जा रही है जो क्रोना वारियर की हैसियत से करोना मरीजों की सेवा में लगे है।चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारियों को भी नही बक्शा है। ऐसे में उनके मनोबल को बढ़ाने के बजाएं सरकार उनके मनोबल को गिराने का प्रयास कर रही है एक तो वह पहले से ही जोखिम वाले क्षेत्र में वो काम करने के लिए तैनात हैं। उनकी सैलरी काटना तो क्या बल्कि उनको उल्टी सम्मान राशि देकर के अलग से सरकार को एक मिसाल पेश कर देनी चाहिए थी । लेकिन ऐसा नहीं हो सका। प्रदेश के कर्मचारियों का जहां तक सवाल है उन्हें उनकी तनख्वाह कटवाने से से कोई परहेज नहीं होता।यदि सरकार द्वारा लाख कोशिश करने पर भी यदि किसी तरह की कमी रहती। क्योंकि कर्मचारी प्रदेश हित में किसी भी हद तक जाने को तैयार है। लेकिन सरकार द्वारा एक तरह का पक्षपातपूर्ण रूव्या अख्तियार किया जा रहा है। क्योंकि वर्तमान सरकार का कर्मचारियों के प्रति जो नजरिया है यह कहीं ना कहीं कर्मचारियों और जनता को गंभीरता से सोचने को मजबूर करता है।
जैसे कि सरकार द्वारा कर्मचारियों को अभी तक उनको 2016 से देह पे स्केल नही मिल पा रहे है।यहां तक कि रूटीन में जो कर्मचारियों को डीए मिलना था वो भी 2 साल से फ्रीज कर दिया गया है। जो अब तक 29 % तक पहुंच गया है।ऐसी डबल इंजन वाली सरकार का क्या फायदा।
कर्मचारियों को 2003 के बाद पेंशन का कोही लाभ नही मिल पा रहा है। कर्मचारियों की मांगों के अनुरूप,कॉन्ट्रैक्ट वाले, ठेकेदारी प्रथा के तहत आउटसोर्स वाले,एड्स कंट्रोल सोसाइटी वाले,करुणामुल आधार पर नौकरियां उपलब्ध करवाने बारे,वाटर करियर वाले,आशा वर्कर्स,आंगनवाड़ी वाले इत्यादि कर्मचारी वर्गों की मांगों को अनसुना करने का जो असफल प्रयास सरकार द्वारा हुआ है उससे कहीं न कहीं कर्मचारियों में पीड़ा है।जब की मंत्रियों और विधायकों को कई स्तर की पेंशन के इलावा बहुत तरह की सुहलियतें भी उपलब्ध है।जिन सहूलियतों का मीटर उनके शफत लेने के पहले ही दिन से पैसों का मीटर घूमना शुरू हो जाता है।
सही मायनों में कर्मचारियों को सरकार की रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
जब प्रदेश में किसी तरह की आफत आती है तो सबसे पहले सरकार कर्मचारियों को ही बलि का बकरा बनाया जाता रहा है। लेकिन मजाल है सरकार अपने मंत्री,संतरी,उच्च अफसरशाई उनके ऐशों आराम और उनके उपर हो रहे सरकारी खर्चों को समाप्त करें या कम तो करें।
इतना होने के बावजूद भी सरकार अपने खर्चों को कम किए बगैर सारा बोझ जनता पर लादने को आतुर हो रही है। जब की कर्मचारी और जनता सरकार की लचर प्रणाली के चलते पहले ही ताबड़तोड़ महंगाई,जिसमे मुख्य:रूप से बिजली,पानी,रसोई गैस, खाद्यान्नों की वस्तुएं, पेट्रोल, डीजल,प्रदेश की धरती पर बनने वाला सीमेंट,निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों का उत्पीड़न इत्यादि जो जनता से सीधे जुड़े मामले हैं और जो बार-बार महंगी दरों पर जनता को उपलब्ध हो रही है।इस पर क्यों सरकार मुखदर्शक है ये समझने वाली बात है। आखिर सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। अगर वह जनता का ही ध्यान ना रखेगी तो ऐसी सरकार का दरअसल अस्तित्व में रहने का भी कोई अधिकार नहीं है।

शिमला से जारी एक प्रेस बयान में हिमाचल प्रदेश आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता एसएस जोगटा ने हिमाचल सरकार पर आरोप लगाया है की वह इस तरह की बचकानी हरकतों से बाज आएं और प्रदेश की आर्थिकी को सुदृढ़ बनाने के लिए मंत्रियों विधायकों और अपने सरकारी जशनो में हो रही फिजूलखर्ची को समाप्त करें।मंत्रिमंडल और उच्च पदों पर विराजमान अफसरशाही के पदों को कम करें। तथा विभिन्न निगमों, बोर्डों में तैनात अध्यक्षों एवं उपाधायक्षों को वापिस बुला दिया जाए। ऐसा करने से प्रदेश की माली हालत को काफी हद तक पटरी पर लाया जा सकता है। अन्यथा प्रदेश पर पहले ही 62000 करोड रुपए का जो कर्जा सर चढ़कर कर बोल रहा है उसकी भरपाई करना भी मुश्किल तो होगा ही लेकिन बार-बार कर्जे पर कर्जा लेना भी सरकार की नाकामी और लापरवाही मानी जा रही है।जिसका अंदाजा प्रदेश की जनता को भी ही गया है। आज आलम ये है कि प्रदेश में 15 लाख के आस पास बेरोजगारो की भी एक बहुत बड़ी फोज खड़ी है। उनके बारे में सरकार के पास न किसी प्रकार की नीति है ना करने की नियत है।
उक्त सभी प्रकार के मामले अगर समय रहते सरकार ने पटरी पर लाए होते तो प्रदेश की जनता और कर्मचारी आज दिल खोलकर सरकार को मदद करते और अपनी हैसियत के हिसाब से अपना अंशदान भी सरकारी खजाने में करते।क्योंकि प्रदेश हमारा है।सरकार में ओर जनता में अच्छे तालमेल होने से ही तालियां भी दोनों हाथों से ही बजाई जाती हैं।कर्मचारी भी प्रदेश की जनता का ही हिस्सा और प्रदेश के ही नागरिक भी है

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